214 सरस्वती महाकवि कालिदास की वाणी में निवास करती थीं। कोई भी उन्हें शास्त्रार्थ में पराजित नहीं कर सकता था। अपार प्रसिद्धि, प्रतिष्ठा और सम्मान प्राप्त करने के बाद, एक बार कालिदास को अपने विद्वान होने का अभिमान हो गया। उन्होंने सोचा कि अब उन्होंने संसार का समस्त ज्ञान अर्जित कर लिया है और अब सीखने के लिए कुछ शेष नहीं है। दुनिया में उनसे बड़ा ज्ञानी कोई नहीं है। एक बार पड़ोसी राज्य से शास्त्रार्थ का निमंत्रण मिलने पर, कालिदास सम्राट विक्रमादित्य से अनुमति लेकर अपने घोड़े पर सवार होकर निकल पड़े। गर्मी का मौसम था। निरंतर यात्रा और तेज़ धूप के कारण कालिदास को प्यास लग गई। थोड़ी खोज करने के बाद, उन्हें एक टूटी-फूटी झोपड़ी दिखाई दी। पानी की आशा में वे उस दिशा में बढ़ गए। झोपड़ी के सामने एक कुआँ भी था। कालिदास ने सोचा कि यदि झोपड़ी में कोई है, तो उससे पानी माँगना चाहिए। तभी, एक छोटी बच्ची वहाँ से घड़े में पानी भरकर निकल रही थी। कालिदास ने उससे कहा— “बेटी! मैं बहुत प्यासा हूँ, मुझे थोड़ा पानी दे दो।” लड़की ने पूछा— “आप कौन हैं? मैं आपको जानती तक नहीं, पहले अपना परिचय दीजिए।” कालिदास को आश्चर्य हुआ कि मुझे कौन नहीं जानता! क्या मुझे अपना परिचय देने की आवश्यकता है? फिर भी, प्यास से व्याकुल होने के कारण उन्होंने कहा— “बेटी, तुम अभी छोटी हो, इसलिए मुझे नहीं जानती हो। घर में कोई बड़ा हो तो बुला दो, वह मुझे देखते ही पहचान जाएगा। मैं बहुत प्रसिद्ध और सम्मानित व्यक्ति हूँ। मैं महान विद्वान हूँ।” लड़की कालिदास के अहंकार और घमंड से प्रभावित नहीं हुई और बोली— “आप झूठ बोल रहे हैं। दुनिया में केवल दो ही बलवान हैं और मैं उन्हें जानती हूँ। यदि आप अपनी प्यास बुझाना चाहते हैं, तो उन दोनों के नाम बताइए?” कुछ सोचकर कालिदास बोले— “मैं नहीं जानता, तुम ही बता दो, लेकिन पहले मुझे पानी दो, मेरा गला सूख रहा है।” लड़की ने कहा— “दो बलवान होते हैं – ‘अन्न’ और ‘जल’। भूख और प्यास में इतनी शक्ति होती है कि वे सबसे शक्तिशाली व्यक्ति को भी झुका सकते हैं। देखिए, आपकी प्यास ने आपको कैसा बना दिया है!” कालिदास स्तब्ध रह गए। लड़की की तर्कशक्ति अविश्वसनीय थी। जो कालिदास बड़े-बड़े विद्वानों को पराजित कर चुके थे, वे आज एक छोटी बच्ची के सामने निरुत्तर खड़े थे। लड़की ने फिर पूछा— “सच बताइए, आप कौन हैं?” कालिदास ने विनम्रता से कहा— “बेटी, मैं एक यात्री (बटोही) हूँ।” लड़की हँसते हुए बोली— “आप फिर झूठ बोल रहे हैं। दुनिया में केवल दो ही असली यात्री हैं, और मैं उन्हें जानती हूँ। बताइए, वे कौन हैं?” प्यास से व्याकुल होकर कालिदास ने फिर अपनी अज्ञानता स्वीकार की। लड़की बोली— “सिर्फ दो ही असली यात्री हैं— ‘सूर्य’ और ‘चंद्रमा’। वे बिना रुके निरंतर चलते रहते हैं। लेकिन आप थक चुके हैं, प्यास से बेहाल हो गए हैं। आप कैसे बटोही हो सकते हैं?” इतना कहकर लड़की पानी का घड़ा लेकर झोपड़ी के अंदर चली गई। अब कालिदास और भी अधिक व्यथित हो गए। उनके जीवन में पहले कभी ऐसी अपमानजनक स्थिति नहीं आई थी। उनके शरीर की शक्ति प्यास के कारण क्षीण हो रही थी। सिर चकराने लगा था। उन्होंने आशा भरी निगाहों से झोपड़ी की ओर देखा। तभी अंदर से एक वृद्धा निकली। उसके हाथ में एक खाली घड़ा था। वह कुएँ से पानी भरने लगी। अब तक बहुत ही विनम्र हो चुके कालिदास ने कहा— “माँ, कृपा कर मुझे पानी दे दो, यह बहुत पुण्य का कार्य होगा।” वृद्धा बोली— “बेटा, मैं तुम्हें नहीं जानती। पहले अपना परिचय दो, फिर मैं तुम्हें अवश्य पानी दूँगी।” कालिदास ने कहा— “मैं एक अतिथि हूँ, कृपया मुझे पानी दें।” वृद्धा बोली— “तुम अतिथि कैसे हो सकते हो? इस संसार में केवल दो ही अतिथि होते हैं— ‘धन’ और ‘यौवन’। ये कब तक टिकेंगे, इसका कोई भरोसा नहीं होता। ये पल भर में चले जाते हैं। सच बताओ, तुम कौन हो?” अब तक अपने सभी तर्कों में पराजित हो चुके कालिदास ने कहा— “मैं सहनशील (धैर्यवान) हूँ, अब तो मुझे पानी दो।” वृद्धा हँसकर बोली— “नहीं, इस दुनिया में केवल दो ही सहनशील हैं— ‘पृथ्वी’ और ‘वृक्ष’। पृथ्वी पापियों और पुण्यात्माओं का बोझ सहन करती है, अपने सीने को चीरकर बीज उगाती है और अन्न देती है। वृक्षों को पत्थर मारो, फिर भी वे मीठे फल देते हैं। तुम कैसे सहनशील हो सकते हो?” कालिदास अब लगभग मूर्छा की अवस्था में पहुँच चुके थे। उन्होंने झुँझलाकर कहा— “मैं ज़िद्दी (हठी) हूँ!” वृद्धा ने मुस्कुराकर कहा— “फिर भी गलत। दुनिया में केवल दो ही ज़िद्दी हैं— ‘नाखून’ और ‘बाल’। चाहे जितना काटो, वे बार-बार बढ़ जाते हैं। सच बताओ, तुम कौन हो?” अब कालिदास पूरी तरह हार चुके थे। उन्होंने सिर झुकाते हुए कहा— “तो फिर मैं मूर्ख हूँ।” वृद्धा ने उत्तर दिया— “नहीं, तुम मूर्ख भी नहीं हो सकते। इस दुनिया में केवल दो ही मूर्ख होते हैं— पहला वह राजा जो बिना योग्यता के शासन करता है, और दूसरा वह दरबारी विद्वान जो राजा की गलत बातों को सही साबित करने के लिए तर्क करता है।” अब कालिदास के पास कहने को कुछ नहीं बचा। वे वृद्धा के चरणों में गिर गए और पानी की भीख माँगने लगे। तभी वृद्धा ने कहा— “उठो, वत्स!” कालिदास ने ऊपर देखा, तो उनके समक्ष स्वयं माता सरस्वती खड़ी थीं। कालिदास ने श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया। माता सरस्वती ने कहा— “ज्ञान का स्रोत शिक्षा होती है, अहंकार नहीं। तुमने जो सम्मान और प्रतिष्ठा अर्जित की, उसे अपनी उपलब्धि मानकर अहंकार कर बैठे। इसलिए तुम्हें सच्चाई का एहसास कराने के लिए यह लीला करनी पड़ी।” कालिदास ने अपनी भूल स्वीकार की। माता सरस्वती के आशीर्वाद से उन्होंने जल ग्रहण किया और आगे बढ़ गए। Was this article helpful?Yes0No0 Leave a Comment Cancel Reply Save my name, email, and website in this browser for the next time I comment. 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