रश्मि की नई जिंदगी और नई पड़ोसन

शाम का समय था। ऑफिस से लौटकर रश्मि ने जैसे ही अपने बैग को सोफे पर रखा, उसने गहरी साँस ली। दिन भर की मीटिंग्स और काम के बाद थोड़ी थकान महसूस हो रही थी। रश्मि एक कामकाजी महिला थी। सुबह जल्दी उठकर वह अपने घर के काम निपटाती, फिर ऑफिस के लिए तैयार हो जाती। ऑफिस में उसका दिन अक्सर मीटिंग, काम और नए प्रोजेक्ट्स में व्यस्त ही गुजरता था।

उस शाम जब वह बालकनी में खड़ी थी, तभी पास वाले घर से हल्की-सी मंत्र जाप की आवाज़ सुनाई दी।

जिज्ञासा से उसने उस तरफ देखा। वहाँ एक महिला अपने घर के मंदिर के सामने बैठकर बहुत श्रद्धा से पूजा कर रही थीं।

दीपक की लौ हल्के-हल्के चमक रही थी और अगरबत्ती की सुगंध हवा में घुली हुई थी। रश्मि को वह दृश्य बहुत शांत और सुकून देने वाला लगा।

पहली मुलाकात

अगले दिन शाम को जब रश्मि ऑफिस से लौटी, तो उसकी मुलाकात उसी महिला से सीढ़ियों पर हो गई।

उन्होंने मुस्कुराकर कहा— “आप सामने वाले फ्लैट में रहती हैं ना?”

रश्मि ने भी मुस्कुराते हुए जवाब दिया— “जी हाँ, मैं रश्मि हूँ। अभी कुछ ही समय पहले यहाँ रहने आई हूँ।”

महिला ने कहा— “मेरा नाम आस्था है। अगर समय मिले तो कभी घर पर आइए, चाय साथ में पिएँगे।”

रश्मि को उनका व्यवहार बहुत अपनापन भरा लगा।

उसे नहीं पता था कि यही छोटी-सी मुलाकात आगे चलकर एक खूबसूरत दोस्ती में बदलने वाली है। धीरे-धीरे रश्मि और आस्था की बातचीत बढ़ने लगी।

एक कप चाय और नई दोस्ती

एक शाम ऑफिस से लौटने के बाद रश्मि बालकनी में खड़ी थी। दिन भर के काम के बाद वह थोड़ी थकी हुई महसूस कर रही थी। तभी सामने वाले घर की बालकनी में आस्था अपनी छोटी-सी बेटी के साथ खेल रही थीं। बेटी खिलखिलाकर हँस रही थी और आस्था उसे प्यार से समझा रही थीं। रश्मि को वह दृश्य बहुत प्यारा लगा।

कुछ देर बाद आस्था ने मुस्कुराकर पूछा— “रश्मि, अगर समय हो तो अंदर आकर एक कप चाय पी लीजिए।”

रश्मि ने सोचा कि थोड़ा समय निकालना अच्छा रहेगा। वैसे भी वह अकेली रहती है और किसी से बात करने का ज़्यादा समय भी नहीं मिलता है।

जब रश्मि आस्था के घर पहुँची, तो उसे वहाँ एक अलग ही सुकून महसूस हुआ। कमरे के एक कोने में छोटा-सा मंदिर था जहाँ दीपक जल रहा था। आस्था की बेटी पास में खिलौनों से खेल रही थी।आस्था रसोई से चाय लेकर आईं और बोलीं— “लो, गर्म-गर्म चाय पीते हैं।”

बातचीत का सिलसिला

चाय पीते-पीते रश्मि ने पूछा— “आस्था जी, क्या आप बच्चों को ट्यूशन भी देती हैं? मैंने आपके घर से शाम के समय कुछ स्कूल के बच्चों को आते हुए देखा।?”

आस्था मुस्कुराईं। “मैं पहले एक स्कूल में हिंदी की अध्यापिका थी।”

फिर उन्होंने अपनी बेटी की ओर देखते हुए कहा— “लेकिन जब से यह मेरी ज़िंदगी में आई है, मैंने काम से थोड़ा ब्रेक ले लिया है, ताकि इसके साथ ज़्यादा समय बिता सकूँ।”

रश्मि ने कहा—“फिर भी आपने पढ़ाना नहीं छोड़ा।”

आस्था हँस पड़ीं— “हाँ, शायद पढ़ाना मेरी आदत बन चुका है। घर पर बच्चों को ट्यूशन पढ़ा देती हूँ और हफ्ते में दो दिन ओपन यूनिवर्सिटी में भी क्लास लेने जाती हूँ।”

रश्मि ने प्रभावित होकर कहा— “यह तो बहुत अच्छी बात है।”

रश्मि ने अपने बारे में बताया कि वह शिमला की रहने वाली है और शादी के बाद वह अपने पति के साथ इस शहर में आई है। पहले वह गुरुग्राम में काम करती थी, लेकिन यहाँ बेंगलुरु में उसे एक अच्छी जॉब ऑपर्च्युनिटी मिल गई, इसलिए वह यहाँ शिफ्ट हो गई। बेंगलुरु, गुरुग्राम के मुकाबले घर से काफ़ी दूर है। हालाँकि वह धीरे-धीरे इस नए माहौल में खुद को ढाल रही है, लेकिन कभी-कभी उसे अपने घर और बचपन की यादें भी आ जाती हैं। उसे खास तौर पर त्योहारों के समय अपने मायके की बहुत याद आती है

आस्था ने मुस्कुराकर कहा—
“तुम बिल्कुल भी चिंता मत करो, हम यहीं हैं। मुझे अपना ही परिवार समझो।

मैं और मेरे पति उत्तराखंड के देहरादून से हैं। हमारे रीति-रिवाज भी काफी हद तक एक जैसे ही हैं।

अगर तुम्हें कभी भी किसी चीज़ में मदद या सहारे की जरूरत हो, तो बिना हिचकिचाए मुझसे कहना।”

रश्मि मुस्कुराते हुए बोली—
“थैंक यू आस्था जी, आपने सच में दिल हल्का कर दिया।

नई जगह पर सबसे मुश्किल यही होता है कि कोई अपना मिल जाए… और लगता है वो मुझे मिल गया है।”

अगला भाग

 

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