असम का इतिहास पूर्व, पश्चिम और उत्तर से आए विभिन्न समुदायों के संगम का इतिहास है; यह तिब्बती-बर्मी (सिनो-तिब्बती), इंडो-आर्यन और ऑस्ट्रोएशियाटिक संस्कृतियों का संगम है।
असम भारत का पूर्वोत्तर प्रहरी है, जिसे मंत्रमुग्ध कर देने वाली और सुरम्य प्राकृतिक सुंदरता से नवाजा गया है। यह राज्य हरी-भरी हरियाली, पहाड़ियों की श्रृंखला और ब्रह्मपुत्र एवं बराक जैसी प्रमुख नदियों से सुशोभित है। यहाँ अनादिकाल से विभिन्न जातियों, जनजातियों और सांस्कृतिक समूहों का निवास रहा है। इन विविध जातियों का आपसी समायोजन और समन्वय असम को गौरवान्वित और समृद्ध बनाता है।
असम के इतिहास के स्रोत कई विविधताओं से समृद्ध हैं। मध्यकालीन असम में अहोम साम्राज्य ने ऐतिहासिक ग्रंथों का संकलन किया, जिन्हें बुरंजी कहा जाता है। ये बुरंजी अहोम और असमिया भाषाओं में लिखे गए थे। प्राचीन असम का इतिहास कामरूप के शिलालेखों, ताम्रपत्रों, मिट्टी की पट्टिकाओं और राजकीय अनुदानों से प्राप्त हुआ है, जो कामरूप के राजाओं ने अपने शासनकाल में जारी किए थे। इसके अलावा, प्रागैतिहासिक काल का पुनर्निर्माण लोककथाओं, महाभारत जैसे महाकाव्यों और असम क्षेत्र में संकलित दो मध्यकालीन ग्रंथों— कालिका पुराण और योगिनी तंत्र से किया गया है।
असम के इतिहास के चार कालखंड
असम का इतिहास चार प्रमुख कालों में विभाजित किया जा सकता है:
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प्राचीन काल (4वीं शताब्दी – 12वीं शताब्दी)
इस युग की शुरुआत 4वीं शताब्दी में सम्राट समुद्रगुप्त के इलाहाबाद स्तंभ लेख में कामरूप का उल्लेख होने और कामरूप राज्य की स्थापना के साथ हुई। -
मध्यकाल (1206 – 1826)
इस काल की शुरुआत बंगाल सल्तनत के आक्रमणों से हुई। पहला आक्रमण 1206 में बख्तियार खिलजी द्वारा किया गया था, जिसका उल्लेख कनई-बोरक्सीबोआ शिलालेख में मिलता है। प्राचीन राज्य के विघटन के बाद इस काल में कई छोटे-छोटे मध्यकालीन राज्यों और सरदारियों का उदय हुआ। -
औपनिवेशिक काल (1826 – 1947)
1826 में यांडाबू संधि के बाद असम ब्रिटिश शासन के अधीन आ गया। इस दौरान अंग्रेजों ने असम पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित कर लिया और इसे अपने प्रशासनिक एवं आर्थिक लाभ के लिए उपयोग किया। -
स्वतंत्रता पश्चात काल (1947 – वर्तमान)
1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद असम एक अलग राज्य बना और इसका सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक विकास जारी है।