उत्तराखंड में घुघुति त्योहार क्यों मनाया जाता है?

मकर संक्रांति उत्तराखंड में उत्तरायणी के रूप में मनाई जाती है। कुमाऊं क्षेत्र में इसे उत्तरायणी पर्व या घुघुति त्योहार के नाम से जाना जाता है। इस दिन हरिद्वार, बागेश्वर आदि संगम स्थलों पर बड़े मेले भी आयोजित किए जाते हैं। इस पर्व पर आटे को गुड़ के साथ गूंथकर विशेष प्रकार की चिड़िया घुघुति (जो पहाड़ों में पाई जाती है) का आकार बनाया जाता है और उसे घी में पकाया जाता है। इसके बाद, इन पकवानों की माला बनाई जाती है, जिसमें संतरे जैसे फल भी डाले जाते हैं।

बच्चे इस माला को पहनकर सुबह उठते हैं और “काले कौवा काले, घुघुति माला खा ले” कहते हुए कौवों को बुलाते हैं और उन्हें यह पकवान खिलाते हैं। यह परंपरा केवल कुमाऊं में ही देखने को मिलती है और यह एक प्राचीन पर्व माना जाता है।


घुघुति त्योहार क्यों मनाया जाता है?

1. राजा कल्याण चंद की कथा:

इस त्योहार से जुड़ी विभिन्न कथाएँ प्रचलित हैं। एक मान्यता के अनुसार, कुमाऊं के राजा कल्याण चंद के कोई संतान नहीं थी। राजा और रानी इस वजह से हमेशा दुखी रहते थे। इस दौरान, राजा के एक मंत्री ने सोचा कि चूंकि राजा का कोई उत्तराधिकारी नहीं है, इसलिए उसे सिंहासन प्राप्त हो सकता है।

राजा ने ज्योतिषियों और परिवार के पुजारियों से परामर्श किया और भगनाथ मंदिर में भगवान शिव से संतान सुख की प्रार्थना की। कुछ समय बाद भगवान शिव की कृपा से राजा को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, जिसका नाम निर्भय चंद रखा गया। रानी उसे प्रेम से “घुघुति” कहकर पुकारती थी। घुघुति को मोतियों की माला बहुत पसंद थी, जिसे वह हमेशा अपने गले में पहने रहता था।

रानी उसे डराने के लिए कहती थी, “अगर ज़िद करोगे तो मैं यह माला कौवे को दे दूंगी।” इसी कारण से घुघुति और कौवों के बीच दोस्ती हो गई।

राजा के मंत्री ने सिंहासन प्राप्त करने के लिए घुघुति को मारने की योजना बनाई। एक दिन जब घुघुति खेल रहा था, तो मंत्री उसे उठा ले गया और जंगल में ले जाने लगा। तभी एक कौवे ने उसे देखा और ज़ोर-ज़ोर से कांव-कांव करने लगा। घुघुति रोने लगा और अपनी माला तोड़कर ज़मीन पर गिरा दी। कौवा वह माला लेकर महल की ओर उड़ गया।

कौवे की आवाज़ सुनकर राजा और रानी महल से बाहर आए। कौवे ने महल में ज़ोर से आवाज़ की और फिर जंगल की ओर उड़ गया। राजा और रानी अपनी सेना के साथ कौवे के पीछे-पीछे गए और वहां जाकर देखा कि मंत्री ने घुघुति को पकड़ रखा था। सैनिकों ने मंत्री को पकड़ लिया और घुघुति को सुरक्षित महल वापस ले आए।

रानी ने प्रसन्न होकर घुघुति के लिए कई पकवान बनाए और कहा कि इन पकवानों को कौवों को भी खिलाना चाहिए। धीरे-धीरे यह परंपरा पूरे कुमाऊं में फैल गई और राजा के आदेश से इस त्योहार को मनाने की परंपरा शुरू हुई, जिसमें कौवों को भोजन खिलाया जाता है।


2. उत्तरायणी और राजा घुघुति की दूसरी लोककथा:

एक अन्य लोककथा के अनुसार, पुराने समय में पहाड़ी क्षेत्रों में राजा घुघुति का शासन था। एक दिन वे गंभीर रूप से बीमार पड़ गए और कई उपचारों के बावजूद ठीक नहीं हो पाए। तब ज्योतिषियों ने बताया कि उत्तरायणी के दिन उनके लिए महा संकट है और उनकी मृत्यु की भविष्यवाणी की गई।

इस संकट से बचने के लिए उपाय बताया गया कि उत्तरायणी के दिन सुबह से ही कौवों को पकवान खिलाने होंगे ताकि वे मृत्यु की घोषणा करने में देर करें। चूंकि कौवे को समय का प्रतीक माना जाता है, इसलिए इस उपाय को पूरे राज्य में अपनाया गया।

मकर संक्रांति के दिन लोगों ने आटे और गुड़ से बनी घुघुति नामक मिठाई तैयार की और सुबह-सुबह कौवों को खिलाई। इस उपाय के चलते राजा की मृत्यु टल गई और यह परंपरा पर्व के रूप में जारी रही।

इस परंपरा का महत्व यह भी है कि लोग रात में ही पकवान बनाकर कौवों के लिए माला तैयार कर देते हैं, ताकि सुबह जल्दी ही उन्हें बुलाकर खिलाया जा सके।


उत्तरायणी पर्व का धार्मिक महत्व:

उत्तरायणी पर्व के दौरान कौवों को बुलाने और खिलाने की एक धार्मिक मान्यता भी है। माना जाता है कि कौवा भगवान विष्णु का परम भक्त है। उत्तरायणी की रात को स्नान कर भगवान विष्णु की पूजा की जाती है।

चूंकि मकर संक्रांति पर शनि ग्रह का प्रभाव अधिक रहता है और शनि का रंग काला होता है, इसलिए इस दिन काले रंग के कौवे को विशेष रूप से बुलाया जाता है।


उत्तरायणी का ऐतिहासिक महत्व:

उत्तरायणी मेला बागेश्वर में आयोजित किया जाता है, जो उत्तराखंड का एक ऐतिहासिक मेला है। कहा जाता है कि यह मेला चंद राजाओं के समय से चला आ रहा है।

सनातन धर्म में मकर संक्रांति के दिन स्नान और दान का विशेष महत्व बताया गया है, इसलिए बड़ी संख्या में लोग सरयू नदी के तट पर इकट्ठा होते हैं। धीरे-धीरे यह परंपरा एक भव्य मेले में बदल गई।

इस मेले में कुमाऊं और नेपाल के पहाड़ी क्षेत्रों से लोग आते हैं और यहां स्थानीय उत्पाद, प्राकृतिक जड़ी-बूटियां, दालें, मसाले और हस्तशिल्प उत्पाद खरीदते हैं।


उत्तरायणी मेले का राजनीतिक महत्व:

उत्तरायणी मेला न केवल धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।

1921 में कुमाऊं केसरी पंडित बद्रीदत्त पांडे और उनके साथियों ने कुली बेगार प्रथा के खिलाफ आवाज़ उठाई थी। इसी दिन बागेश्वर मेले में कुली बेगार से जुड़े दस्तावेज और रजिस्टर सरयू नदी में बहा दिए गए, जिससे यह मेला स्वतंत्रता संग्राम का भी प्रतीक बन गया।

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