देवप्रयाग का रघुनाथ मंदिर: जहाँ आस्था, इतिहास और प्रकृति एक साथ मिलते हैं

कथाओं के अनुसार, लंका विजय के बाद भगवान राम ने ब्रह्महत्यादोष से मुक्ति पाने के लिए यहीं पर कठोर तप किया था। कहा जाता है कि उनकी तपस्या से यह भूमि और भी पवित्र हो गई और तभी से इस स्थान पर रघुनाथ मंदिर की स्थापना मानी जाती है।

“अच्छा… और उसके बाद क्या हुआ, पंडित जी?”
अथर्वा ने जैसे ही उत्सुकता से यह प्रश्न पूछा, मंदिर में बैठे सभी भक्तों का ध्यान एकदम उसी की ओर खिंच गया। उसे तुरंत एहसास हुआ कि शायद उसने ज़रा ज़्यादा ही जोश में यह बात ऊँची आवाज़ में कह दी, और अब सभी लोग उसी को देखकर मुस्कुरा रहे थे।

पंडित जी ने भी मंद–मंद मुस्कराते हुए उसकी ओर देखा। फिर वे बाकी भक्तों की ओर मुड़े और बोले,
“आप सब भी थोड़ा पास आ जाइए। अब उम्र हो चली है, मेरी आवाज़ दूर तक पहुँच नहीं पाती।”

इतना सुनते ही सभी भक्त धीरे-धीरे आगे आकर मंदिर के प्रांगण में एक साथ बैठ गए। हवा में हल्की अगरबत्ती की खुशबू घुल रही थी, घंटियों की ध्वनि अब धीमी होकर जैसे केवल पृष्ठभूमि बन गई थी।

पंडित जी ने अपने आसन को थोड़ा सीधा किया, गर्दन झुकाई और धीर—गंभीर स्वर में कथा आरंभ की—

“तो सुनो बच्चा… आगे की बात बड़ी अद्भुत है…”

atharva listening a story

भाग 1: ब्रह्महत्या का पाप और पांडवों की कथा

मंदिर के प्रांगण में हल्की रोशनी फैल रही थी। घंटियाँ हौले-हौले बज रही थीं और गंगा की ध्वनि दूर से आती प्रतीत हो रही थी।

अथर्वा ने उत्सुकता से पंडित जी की ओर देखते हुए पूछा—
“पंडित जी… ब्रह्महत्या का पाप सच में इतना भयानक होता है?”

पंडित जी ने गहरी साँस ली और कथा आगे बढ़ाई—

“कहते हैं कि ब्रह्महत्या का पाप इतना भयानक माना गया है कि उससे मनुष्य क्या, देवता और स्वयं भगवान भी अछूते नहीं रहते। इसी कारण, जब गुरु द्रोणाचार्य का वध हुआ, तो पांडवों के मन में भी यह भय जागा कि कहीं वे इस पाप के भागी न बन जाएँ।
इसलिए वे प्रायश्चित के लिए हिमालय की ओर निकले। वहाँ उन्हें महादेव की पूजा करनी थी, परंतु भगवान शिव… वे तो उनसे रूठे हुए थे। दर्शन देना स्वीकार नहीं किया, और अंतर्ध्यान होकर छिप गए।

लेकिन भीम कहाँ मानने वाले थे।
उन्होंने शिव का पीछा किया, और तभी शिव ने एक बैल का रूप धर लिया—धरती के भीतर जाने लगे। भीम ने झट से उनके पैरों को पकड़ लिया, और पकड़ इतनी सशक्त थी कि शिव का शरीर अलग-अलग भागों में पृथ्वी के ऊपर प्रकट हो गया।
उन्हीं दिव्य स्थलों पर आगे चलकर पंच केदार स्थापित हुए।”

अथर्वा ने अपनी आँखें चौड़ी कर देखी—
“तो वही पंच केदार…? मैंने उसके बारे में किताबों में पढ़ा है।”

पंडित जी ने सिर हिलाया—
“सही कहा बच्चा। यही ब्रह्महत्या का पाप है—इतना बड़ा कि इसे मिटाने के लिए तपस्या और प्रायश्चित आवश्यक हैं।
पांडवों की यह कथा हमें यह सिखाती है कि धर्म और मर्यादा को बनाए रखना सबसे महत्वपूर्ण है। जब तक पाप का प्रायश्चित न हो, मनुष्य की आत्मा पूर्ण रूप से शुद्ध नहीं हो सकती।”

फिर वे धीमे स्वर में बोले—

“पांडवों की इस कथा से हम सब परिचित हैं…
लेकिन क्या आप जानते हैं—जब रावण जैसा प्रकांड ब्राह्मण और महान विद्वान युद्ध में मारा गया, तो क्या भगवान श्रीरामचंद्र को भी यही पाप लगा?”

मंदिर में बैठे सभी भक्तों ने आपस में धीमी-धीमी फुसफुसाहट शुरू कर दी। कोई इस प्रश्न का उत्तर निश्चित रूप से नहीं जानता था।

पंडित जी मुस्कुराए—

“और यदि उन्हें यह पाप लगा… तो वे इससे मुक्त कैसे हुए?
यही है आज की कथा का सबसे अद्भुत हिस्सा…”

भाग 2: रावण-वध और श्रीराम की तपस्या

पंडित जी ने कथा का अगला पन्ना खोलते हुए कहा—

“रावण… जो कि एक ब्राह्मण, आचार्य और अपार विद्या का धनी था… जब उसका वध हुआ, तो ऐसा माना गया कि भगवान श्रीराम पर भी ब्रह्महत्या-दोष की छाया पड़ी।
हालाँकि रावण-वध धर्म की रक्षा के लिए अनिवार्य था, फिर भी मर्यादा पुरुषोत्तम होने के नाते श्रीराम ने सोचा कि प्रायश्चित तो करना ही चाहिए। यही धर्म का मार्ग है, यही आदर्श।”

उन्होंने थोड़ा ठहरकर अपनी निगाह भक्तों पर टिकाई—

भक्त शांत बैठे रहे। माहौल इतना स्थिर था जैसे समय ठहर गया हो।

पंडित जी आगे बोले— “इसलिए श्रीराम उत्तर दिशा की ओर बढ़े और पहुँचे देवप्रयाग, वह पवित्र स्थल जहाँ मंदाकिनी और अलकनंदा का संगम होता है। वहाँ उन्होंने गंगा में स्नान किया, दान किया, मंत्रों का जप किया और कठोर तपस्या की।
कहते हैं कि इसी तपस्या के कारण देवप्रयाग को ‘राम-तपस्थली’ कहा जाने लगा।
और उसी तपस्या के दौरान देवताओं ने श्रीराम को आशीर्वाद दिया—‘हे राम, आपका मन निर्मल है, अब आप इस पाप से मुक्त हैं।’”

अथर्वा ने विस्मय से पूछा—
“क्या सच में इतने दिनों की तपस्या के बाद उन्हें पाप से मुक्ति मिली?”

पंडित जी ने धीरे-धीरे सिर हिलाया—
“हाँ बच्चा। तपस्या और प्रायश्चित से न केवल शरीर, बल्कि मन और आत्मा भी शुद्ध होते हैं। यही आध्यात्मिक शिक्षा है, जो हमें इस कथा से मिलती है।”

मंदिर की घंटी हौले से बजी, जैसे कथा की पवित्रता में और रंग घोलने लगी हो।

भाग 3: रघुनाथजी मंदिर और देवप्रयाग का आध्यात्मिक महत्व

पंडित जी ने मुस्कुराते हुए कहा—
“और बच्चा, इस संगम के किनारे ही श्री रघुनाथजी का मंदिर स्थित है। यह लगभग हज़ार साल पुराना मंदिर दक्षिण भारतीय शैली में बना है। यहाँ गर्भगृह में श्रीराम, लक्ष्मण और माता सीता की मूर्तियाँ हैं, और भक्तों को अद्भुत शांति और दिव्य ऊर्जा का अनुभव होता है।
मंदिर परिसर में घंटियाँ, अगरबत्तियाँ, और मंत्रोच्चार एक ऐसा वातावरण बनाते हैं, जिसमें समय मानो थम जाता है।”

रघुनाथजी मंदिर — राम तपस्या की जीवित स्मृति

यह मंदिर लगभग हज़ार वर्ष पुराना है।
दक्षिण भारतीय शैली में बने इस वैष्णव धाम में महाभारतकाल के भी संदर्भ मिलते हैं।
और संगम के ठीक पास खड़े इस देवालय में प्रवेश करते ही मन बड़ी अद्भुत शांति से भर जाता है… जैसे स्वयं श्रीराम का आशीर्वाद मिला हो।”

“यहाँ आकर भक्त न केवल अपने शरीर को, बल्कि अपने मन और आत्मा को भी शुद्ध करते हैं। यही देवप्रयाग की वास्तविक महिमा है—इतिहास, धर्म और भक्ति का संगम।”

अथर्वा ने धीरे से कहा—
“अब समझ आया पंडित जी… यही जगह इतनी खास क्यों है। यह सिर्फ संगम नहीं… एक जीवित कहानी है, जो हमें धर्म, तपस्या और भक्ति का पाठ देती है।”

अथर्व के मन में अब भी कई सवाल घूम रहे थे।
संगम की लहरों को निहारते हुए, उसने धीरे-धीरे पंडित जी की तरफ देखा।

कुछ पल चुप रहने के बाद वह बोला,
“पंडित जी… हमें संगम के बारे में और कुछ बताइए ना?”

उसकी आवाज़ में वही मासूम जिज्ञासा थी, जो उसे हमेशा अलग बनाती थी।

पंडित जी ने मुस्कुराते हुए उसकी तरफ देखा।
उन्होंने उसकी आँखों में वही चमक देखी—जो किसी ऐसे बच्चे में होती है जिसे जानने-समझने की भूख हो।

उन्होंने कहा,
“बेटा, तुम बहुत अच्छे सवाल पूछते हो। और संगम की कहानी तो इतनी सुंदर है कि इसे सुनाए बिना यहाँ से जाना अधूरा सा लगता है… आओ, थोड़ा पास आकर बैठ जाओ।”

अथर्व तुरंत आगे बैठ गया। उसके मम्मी-पापा भी उसके पास आकर धार के किनारे पत्थरों पर बैठ गए। आस-पास के कुछ और भक्त भी शांत होकर पंडित जी की ओर देखने लगे।

ठंडी हवा संगम से आकर उनके चेहरे को छू रही थी।
अलकनंदा का हरा-नीला जल, मंदाकिनी की चांदी सी चमक—दोनों एक जगह मिलकर एक दिव्य स्वर बना रहे थे।

पंडित जी ने अपनी दंड-काष्ठ को पास रखा और बोले—

“देखो बेटा… यह सिर्फ पानी का संगम नहीं है, यह आस्था का मिलन है। यहाँ दो देवियों—अलकनंदा और मंदाकिनी—का पवित्र मिलन होता है। और इसी से आगे जाकर माँ गंगा का असली प्रवाह शुरू होता है।”

अथर्व ध्यान से सुन रहा था, उसकी आँखें संगम की लहरों से नहीं हट रही थीं।
वह धीरे से बोला,
“मतलब… यहीं गंगा जी का जन्म होता है?”

पंडित जी मुस्कुराए—
“हाँ बेटा, इसलिए देवप्रयाग को गंगा का वास्तविक जन्मस्थान भी कहा जाता है। और यही वो जगह है जहाँ भगवान श्रीराम ने रावण-वध के बाद तप किया था… जिसका महत्व बहुत कम लोग जानते हैं।”

यह सुनते ही अथर्व की आँखें अचानक और बड़ी हो गईं।
उसके मन में नया सवाल बिजली की तरह कौंधा—
“सच में?? राम जी यहीं आए थे?”

उसने उत्साह से पंडित जी की ओर देखा—
अब वह अगली कहानी सुनने को तैयार था।

रघुनाथजी मंदिर का इतिहास और स्थापत्य

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